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डॉ. चमोली

स्पैजिरिक इलेक्ट्रो-होम्योपैथी: सरल भाषा में

इलेक्ट्रो-होम्योपैथी कहाँ से आई, 'स्पैजिरिक' का क्या अर्थ है, और पौधों पर आधारित ये औषधियाँ कैसे बनती और ली जाती हैं।

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देहरादून में स्वस्तिक इलेक्ट्रोहोम्योपैथिक क्लिनिक का भवन

शुरुआत

इलेक्ट्रो-होम्योपैथी को 1860 के दशक में इटली के काउंट सेसारे मैटेई ने विकसित किया था। नाम के बावजूद इसमें बिजली का उपयोग नहीं होता। मैटेई मानते थे कि उनकी वनस्पति औषधियाँ शरीर की जीवन-ऊर्जा पर काम करती हैं, जिसे वे 'विद्युत' ऊर्जा कहते थे, और यही नाम प्रचलित हो गया।

भारत में इलेक्ट्रो-होम्योपैथी का अभ्यास बी.ई.एम.एस. जैसे इलेक्ट्रो-होम्योपैथी पाठ्यक्रमों के स्नातक करते हैं।

'स्पैजिरिक' का अर्थ

स्पैजिरिक शब्द ग्रीक भाषा के स्पाओ (अलग करना) और एजेइरो (जोड़ना) से बना है। यह पौधों से औषधि बनाने की उस विधि का नाम है जो 16वीं सदी के चिकित्सक पैरासेल्सस से जुड़ी है: पौधे को किण्वन और आसवन जैसी प्रक्रियाओं से उसके घटकों में अलग किया जाता है और फिर उन घटकों को दोबारा मिलाया जाता है।

इलेक्ट्रो-होम्योपैथिक औषधियाँ इसी स्पैजिरिक विधि से तैयार किए गए पौधों के अर्क से बनती हैं।

औषधियों का उपयोग कैसे होता है

परामर्श के बाद हर व्यक्ति के लिए अलग औषधि चुनी जाती है, जो आमतौर पर पतला की गई बूँदों या गोलियों के रूप में ली जाती है। इलेक्ट्रो-होम्योपैथी बीमारी को रक्त और लसीका (लिम्फ़) के असंतुलन के रूप में देखती है, और औषधियाँ इसी संतुलन को ध्यान में रखकर चुनी जाती हैं।

दूसरे इलाज के साथ उपयोग

स्पैजिरिक औषधियाँ पौधों से बनती हैं, फिर भी वे दवाएँ ही हैं। डॉ. चमोली को अपनी दूसरी दवाओं, सप्लीमेंट, गर्भावस्था या एलर्जी के बारे में ज़रूर बताएँ, और अपने अन्य डॉक्टरों को भी बताएँ कि आप क्या ले रहे हैं।

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